[Lyrics] शिव तांडव स्तोत्र हिंदी भावार्थ Shiv Tandav Stotram in hindi

SHIV TANDAV STOTRAM IN HINDI

…..शिव तांडव स्तोत्र हिंदी भावार्थ सहित…..

Shiv Tandav Stotram


शिव स्त्रोतम का महत्व क्यों है वो हम जान लेते है। 


रावण भगवान शिव का महान भक्त था, और उनके बारे में अनेक कहानियां प्रचलित हैं। एक भक्त को महान नहीं होना चाहिये लेकिन वह एक महान भक्त था। वह दक्षिण से इतनी लंबी दूरी तय कर के कैलाश आया- मैं चाहता हूँ कि आप बस कल्पना करें, इतनी लंबी दूरी चल के आना – और वो शिव की प्रशंसा में स्तुति गाने लगा। उसके पास एक ड्रम था, जिसकी ताल पर उसने तुरंत ही 1008 छंदों की रचना कर डाली, जिसे शिव तांडव स्तोत्र के नाम से जाना जाता है।

उसके संगीत को सुन कर शिव बहुत ही आनंदित व मोहित हो गये। रावण गाता जा रहा था, और गाने के साथ–साथ उसने दक्षिण की ओर से कैलाश पर चढ़ना शुरू कर दिया। जब रावण लगभग ऊपर तक आ गया, और शिव उसके संगीत में मंत्रमुग्ध थे, तो पार्वती ने देखा कि एक व्यक्ति ऊपर आ रहा था।

अब ऊपर, शिखर पर केवल दो लोगों के लिये ही जगह है। तो पार्वती ने शिव को उनके हर्षोन्माद से बाहर लाने की कोशिश की। वे बोलीं, “वो व्यक्ति बिल्कुल ऊपर ही आ गया है”।

अब ऊपर, शिखर पर केवल दो लोगों के लिये ही जगह है। तो माता पार्वती ने शिव को उनके हर्षोन्माद से बाहर लाने की कोशिश की। वे बोलीं, “वो व्यक्ति बिल्कुल ऊपर ही आ गया है”। लेकिन शिव अभी भी संगीत और काव्य की मस्ती में लीन थे। आखिरकार पार्वती उनको संगीत के रोमांच से बाहर लाने में सफल हुईं। और जब रावण शिखर तक पहुंच गया तो शिव ने उसे अपने पैर से धक्का मार कर नीचे गिरा दिया। रावण, कैलाश के दक्षिणी मुख से फिसलते हुए नीचे की ओर गिरा। ऐसा कहा जाता है कि उसका ड्रम उसके पीछे घिसट रहा था और जैसे-जैसे रावण नीचे जाता गया, उसका ड्रम पर्वत पर ऊपर से नीचे तक, एक लकीर खींचता हुआ गया।अगर आप कैलाश के दक्षिणी मुख को देखें तो आप बीच में से ऊपर से नीचे की तरफ आता एक निशान देख सकते हैं ।

कैलाश पर्वत के एक मुख और दूसरे मुख के बीच में अंतर या भेदभाव करना ठीक नहीं है, लेकिन कैलाश का दक्षिण मुख हमें ज्यादा प्रिय है क्योंकि अगस्त्य मुनि कैलाश के दक्षिणी मुख में विलीन हो गये थे और मुझे लगता है कि ये सबसे ज्यादा सुंदर है। ये सबसे ज्यादा श्वेत भी है क्योंकि वहां बहुत ज्यादा बर्फ है।

कई तरीकों से, इस मुख में सबसे ज्यादा तीव्रता है। लेकिन बहुत ही कम लोग हैं जो कैलाश के दक्षिणी मुख की ओर जा सकते हैं। ये बहुत ही दुर्गम है और वहां पहुंचना कम लोगों के लिये संभव है, क्योंकि इसका मार्ग अन्य मुखों की तुलना में बहुत ज्यादा कठिन है और कुछ ख़ास तरह के लोग ही वहां जा सकते हैं।

 

जटाटवी-गलज्जल-प्रवाह-पावित-स्थले

गलेऽव-लम्ब्य-लम्बितां-भुजङ्ग-तुङ्ग-मालिकाम्

डमड्डमड्डमड्डम-न्निनादव-ड्डमर्वयं

चकार-चण्ड्ताण्डवं-तनोतु-नः शिवः शिवम् ..1..

उनके बालों से बहने वाले जल से उनका कंठ पवित्र है,

और उनके गले में सांप है जो हार की तरह लटका है,

और डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है,

भगवान शिव शुभ तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे हम सबको संपन्नता प्रदान करें।

जटा-कटा-हसं-भ्रमभ्रमन्नि-लिम्प-निर्झरी-

-विलोलवी-चिवल्लरी-विराजमान-मूर्धनि .

धगद्धगद्धग-ज्ज्वल-ल्ललाट-पट्ट-पावके

किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ..2..

मेरी शिव में गहरी रुचि है,

जिनका सिर अलौकिक गंगा नदी की बहती लहरों की धाराओं से सुशोभित है,

जो उनकी बालों की उलझी जटाओं की गहराई में उमड़ रही हैं?

जिनके मस्तक की सतह पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित है,

और जो अपने सिर पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं।

धरा-धरेन्द्र-नंदिनीविलास-बन्धु-बन्धुर

स्फुर-द्दिगन्त-सन्ततिप्रमोद-मान-मानसे .

कृपा-कटाक्ष-धोरणी-निरुद्ध-दुर्धरापदि

क्वचि-द्दिगम्बरे-मनो विनोदमेतु वस्तुनि ..3..

मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे,

अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके मन में मौजूद हैं,

जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं,

जो अपनी करुणा दृष्टि से असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है,

और जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं।

जटा-भुजङ्ग-पिङ्गल-स्फुरत्फणा-मणिप्रभा

कदम्ब-कुङ्कुम-द्रवप्रलिप्त-दिग्व-धूमुखे

मदान्ध-सिन्धुर-स्फुरत्त्व-गुत्तरी-यमे-दुरे

मनो विनोदमद्भुतं-बिभर्तु-भूतभर्तरि ..4..

मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं,

उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है,

ये दिशाओं की देवियों के सुंदर चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है,

जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है।

सहस्रलोचनप्रभृत्य-शेष-लेख-शेखर

प्रसून-धूलि-धोरणी-विधू-सराङ्घ्रि-पीठभूः

भुजङ्गराज-मालया-निबद्ध-जाटजूटक:

श्रियै-चिराय-जायतां चकोर-बन्धु-शेखरः ..5..

भगवान शिव हमें संपन्नता दें,

जिनका मुकुट चंद्रमा है,

जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हैं,

जिनका पायदान फूलों की धूल के बहने से गहरे रंग का हो गया है,

जो इंद्र, विष्णु और अन्य देवताओं के सिर से गिरती है।

ललाट-चत्वर-ज्वलद्धनञ्जय-स्फुलिङ्गभा-

निपीत-पञ्च-सायकं-नमन्नि-लिम्प-नायकम्

सुधा-मयूख-लेखया-विराजमान-शेखरं

महाकपालि-सम्पदे-शिरो-जटाल-मस्तुनः..6..

शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें,

जिन्होंने कामदेव को अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिनगारी से नष्ट किया था,

जो सारे देवलोकों के स्वामियों द्वारा आदरणीय हैं,

जो अर्ध-चंद्र से सुशोभित हैं।

कराल-भाल-पट्टिका-धगद्धगद्धग-ज्ज्वल

द्धनञ्ज-याहुतीकृत-प्रचण्डपञ्च-सायके

धरा-धरेन्द्र-नन्दिनी-कुचाग्रचित्र-पत्रक

-प्रकल्प-नैकशिल्पिनि-त्रिलोचने-रतिर्मम …7..

मेरी रुचि भगवान शिव में है, जिनके तीन नेत्र हैं,

जिन्होंने शक्तिशाली कामदेव को अग्नि को अर्पित कर दिया,

उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्… की घ्वनि से जलती है,

वे ही एकमात्र कलाकार है जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के स्तन की नोक पर,

सजावटी रेखाएं खींचने में निपुण हैं।

नवीन-मेघ-मण्डली-निरुद्ध-दुर्धर-स्फुरत्

कुहू-निशी-थिनी-तमः प्रबन्ध-बद्ध-कन्धरः

निलिम्प-निर्झरी-धरस्त-नोतु कृत्ति-सिन्धुरः

कला-निधान-बन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ..8..

भगवान शिव हमें संपन्नता दें,

वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं,

जिनकी शोभा चंद्रमा है,

जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है,

जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है।

प्रफुल्ल-नीलपङ्कज-प्रपञ्च-कालिमप्रभा-

-वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचिप्रबद्ध-कन्धरम् .

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदांधकछिदं तमंतक-च्छिदं भजे ..9..

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा है,

पूरे खिले नीले कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ,

जो ब्रह्माण्ड की कालिमा सा दिखता है।

जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,

जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,

जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,

और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।

अखर्वसर्व-मङ्ग-लाकला-कदंबमञ्जरी

रस-प्रवाह-माधुरी विजृंभणा-मधुव्रतम् .

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं

गजान्त-कान्ध-कान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ..10..

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनके चारों ओर मधुमक्खियां उड़ती रहती हैं

शुभ कदंब के फूलों के सुंदर गुच्छे से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण,

जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,

जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,

जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,

और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।

जयत्व-दभ्र-विभ्र-म-भ्रमद्भुजङ्ग-मश्वस-

द्विनिर्गमत्क्रम-स्फुरत्कराल-भाल-हव्यवाट्

धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्ग-तुङ्ग-मङ्गल

ध्वनि-क्रम-प्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ..11..

शिव, जिनका तांडव नृत्य नगाड़े की ढिमिड ढिमिड

तेज आवाज श्रंखला के साथ लय में है,

जिनके महान मस्तक पर अग्नि है, वो अग्नि फैल रही है नाग की सांस के कारण,

गरिमामय आकाश में गोल-गोल घूमती हुई।

दृष-द्विचित्र-तल्पयोर्भुजङ्ग-मौक्ति-कस्रजोर्

-गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्वि-पक्षपक्षयोः .

तृष्णार-विन्द-चक्षुषोः प्रजा-मही-महेन्द्रयोः

समप्रवृतिकः कदा सदाशिवं भजे .. 12..

मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता,

जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि,

घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति,

सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति,

सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति

कदा निलिम्प-निर्झरीनिकुञ्ज-कोटरे वसन्

विमुक्त-दुर्मतिः सदा शिरःस्थ-मञ्जलिं वहन् .

विमुक्त-लोल-लोचनो ललाम-भाललग्नकः

शिवेति मंत्र-मुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ..13..

मैं कब प्रसन्न हो सकता हूं, अलौकिक नदी गंगा के निकट गुफा में रहते हुए,

अपने हाथों को हर समय बांधकर अपने सिर पर रखे हुए,

अपने दूषित विचारों को धोकर दूर करके, शिव मंत्र को बोलते हुए,

महान मस्तक और जीवंत नेत्रों वाले भगवान को समर्पित

इदम् हि नित्य-मेव-मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं

पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धि-मेति-संततम् .

हरे गुरौ सुभक्तिमा शुयातिना न्यथा गतिं

विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ..16..

इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है,वह सदैव के 

लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है।इस भक्ति 

के 

लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है।बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर

 कर देता है।

अगर आपको भगवान् शिव के महान भक्त दशानन रावण के द्वारा “शिव तांडव स्त्रोतम” की रचना की यह कहानी पसंद आई तो इस पोस्ट को अपने दोस्तों और परिवार के लोगो के साथ सांझा करे।

हर हर महादेव 🙏

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